14 Jun 2017

वेदौषधी निर्माणशाला स्वास्थ्यसूत्रमाला - 14

आयुर्वेदीय आहारविधी - 6

e0a486e0a4afe0a581e0a4b0e0a58de0a4b5e0a587e0a4a6e0a580e0a4af20e0a486e0a4b9e0a4bee0a4b0e0a4b5e0a4bfe0a4a7e0a580202d2036

Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 14 Jun 2017 Views : 1649
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
14 Jun 2017 Views : 1649

आहार और मानसिक भाव

Diet & psychological factors

आयुर्वेदीय आहारविधी का छठवाँ नियम है - इष्टे देशे इष्टसर्वोपकरणं अश्नीयात

इष्टे देशे - अर्थात आहार सेवन करने का जो स्थान है वह इष्ट होना चाहिए। इष्ट मतलब मनोनुकूल, मन प्रसन्न करनेवाला। आहार का स......

read more

08 Jun 2017

वेदौषधी निर्माणशाला स्वास्थ्यसूत्रमाला - 13

आयुर्वेदीय आहारविधी - 5

e0a486e0a4afe0a581e0a4b0e0a58de0a4b5e0a587e0a4a6e0a580e0a4af20e0a486e0a4b9e0a4bee0a4b0e0a4b5e0a4bfe0a4a7e0a580202d2035

Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 08 Jun 2017 Views : 908
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
08 Jun 2017 Views : 908

आयुर्वेदीय आहारविधी का पाँचवा नियम है - वीर्याविरुद्धमश्नीयात।

अर्थात अविरूद्ध वीर्यवाले आहारद्रव्य/खाद्यपदार्थ एकसाथ ही खाने चाहिए। मतलब जिन दो खाद्यपदार्थों का वीर्य समान हो उन्हें ही साथ-साथ/ एकसाथ खा सकते है।

परंतु अब वीर्य मतलब क्या?

आयुर्वेदीय परिभाषा में वीर्य का मतलब Potency होता है। अर्थात किसी......

read more

06 Jun 2017

वेदौषधी निर्माणशाला स्वास्थ्यसूत्रमाला - 12

आयुर्वेदीय आहारविधी - 4

e0a486e0a4afe0a581e0a4b0e0a58de0a4b5e0a587e0a4a6e0a580e0a4af20e0a486e0a4b9e0a4bee0a4b0e0a4b5e0a4bfe0a4a7e0a580202d2034

Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 06 Jun 2017 Views : 811
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
06 Jun 2017 Views : 811

जीर्णे अश्नीयात -

आयुर्वेदीय आहारविधी का चौथा नियम है - जीर्णे अश्नीयात। अर्थात पहले सेवन किये हुए आहार का जब पूर्णरूप से पाचन हो जाये तभी पुनः भोजन करना चाहिए। मतलब भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए। आहारकाल यह भोजनविधी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। शरीर को स्वस्थ बनाए रखनेवाले अनेक कारणों मे से भोजनकाल एक है। नियत समय पर भोजन करने से अन्नपचन निर......

read more

06 Jun 2017

वेदौषधी निर्माणशाला स्वास्थ्यसूत्रमाला - 11

आयुर्वेदीय आहारविधी - 3

e0a486e0a4afe0a581e0a4b0e0a58de0a4b5e0a587e0a4a6e0a580e0a4af20e0a486e0a4b9e0a4bee0a4b0e0a4b5e0a4bfe0a4a7e0a580202d2033

Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 06 Jun 2017 Views : 870
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
06 Jun 2017 Views : 870

आयुर्वेदीय आहारविधी का तिसरा नियम है - मात्राशी स्यात्। अर्थात आहार सदैव उचित मात्रा में ही लेना चाहिए। अब यह 'उचित मात्रा' (Optimum quantity) मतलब कितनी मात्रा? तो आयुर्वेद इसकी व्याख्या करता है 'अग्निबलापेक्षिणी' अर्थात प्रत्येक व्यक्ति की उचित मात्रा यह उस व्यक्ति के पाचकाग्नि के बल (ताकत) पर निर्भर करती है। इसीलिए सबके लिए एक ही मात्रा का निर्धारण ......

read more

06 Jun 2017

वेदौषधी निर्माणशाला स्वास्थ्यसूत्रमाला - 10

आयुर्वेदीय आहारविधी भाग - 2

e0a486e0a4afe0a581e0a4b0e0a58de0a4b5e0a587e0a4a6e0a580e0a4af20e0a486e0a4b9e0a4bee0a4b0e0a4b5e0a4bfe0a4a7e0a58020e0a4ade0a4bee0a497202d2032

Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 06 Jun 2017 Views : 1107
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
06 Jun 2017 Views : 1107

आहार में स्निग्ध पदार्थो का उपयोग : क्या सही क्या गलत?

आयुर्वेदीय आहारविधी का दूसरा नियम है स्निग्धं अश्नीयात् अर्थात भोजन मे सदैव स्निग्ध पदार्थ होना चाहिये। स्निग्ध अर्थात घी और तैल से बने पदार्थ, न कि घी या तैल मे तले हुये। कोई भी यंत्र सुचार......

read more